17 August, 2018

मस्त मंजीरा

मस्त मंजीरा खनकाय रही मीरा औरु
रस की गगरिया रसखान ढरकाबै हैं
संग संग खेलैं खेल सूर ग्वाल-बालन के
दुहि पय धेनु को पतूखी में पियाबैं है
कूटि कूटि भरे लोकतत्व के सकोरा
गीत गाथन की ध्वनि जहां कान पिर जाबै है
ऐसी बृजभूमि एक बेर देखिबे के काज
देवता के देवता को मनु ललचाबै है

-डा० जगदीश व्योम


आयौ है बसंत

आयौ है बसंत घर नहिं सखि कंत आयौ
पंथ हेरि हारि गई अँखियाँ हमारी हैं
कुहुकि कुहुकि के संदेशों सो सुनाय रही
अमवा की डारन के पांव भए भारी हैं
हिय में हिलोर औरु मीठी सी मरोर उठै
पीर पोर पोर अंग अंग में खुमारी है
मारि मारि तारी हँसै वेदना कुँवारी, पिय
ऐसौ है अनारी एक चिठिया न डारी है

-डा० जगदीश व्योम

लेखनी चलाने वाले

लेखनी चलाने वाले भावुक हृदय हम
  वक्त आने पर कर वज्र थाम लेते हैं
शक्ति का जवाब शान्ति से नहीं सुनाई देता
  हम ऐसे वक्त शक्ति से ही काम लेते हैं
बात अपनी पे व्योम रहते सदा अटल
  बढ़ते कदम नहीं विसराम लेते हैं
जनता की एक-एक साँस के अकूत बल
  सम्बल से काल का भी हाथ थाम लेते हैं


 -डा० जगदीश व्योम

09 December, 2017

नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन

नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन आमों पर खूब बौर आये भँवरों की टोली मँडराये बगिया की अमराई में फिर कोकिल पंचम स्वर में गाये फिर उठें गंध के गुब्बारे फिर महके अपना चन्दन वन नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन गौरैया बिना डरे आये घर में घोंसला बना जाये छत की मुँडेर पर बैठ काग कह काँव-काँव फिर उड़ जाये मन में मिसिरी घुलती जाये सबके आँगन हों सुखद सगुन नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन बच्चों से छिने नहीं बचपन वृद्धों का ऊबे कभी न मन हो साथ जोश के होश सदा मर्यादित बनी रहे फैशन जिस्मों की यूँ न नुमाइश हो बदरँग हो जायें घर आँगन नववर्ष तुम्हारा अभिनन्दन घाटी में फिर से फूल खिलें फिर रुके शिकारे तैर चलें बह उठे प्रेम की मन्दाकिनि हिम-शिखर हिमालय से पिघलें सोनी मचले, महिबाल चले राँझे की हीर करे नर्तन नववर्ष तुम्हारा अभिनन्दन विज्ञान ज्ञान के छुए शिखर पर चले शांति के ही पथ पर हिन्दी भाषा के पंख लगा कम्प्यूटर जी पहुँचें घर-घर वे देश रहें खुशहाल ‘व्योम’ धरती पर जहाँ प्रवासी जन नववर्ष तुम्हारा अभिनन्दन थोड़ी-सी राजनीति सुधरे थोड़ा-सा जनगण भी सुधरे मीडिया चले सच के पथ पर छँट जायें निराशा के कुहरे शिक्षा के विस्तृत आँगन में कुछ और हो सके परिवर्तन नववर्ष तुम्हारा अभिनन्दन -डॉ0 जगदीश व्योम

14 October, 2017

दीप की वर्तिका

दीप की वर्तिका जगमगाती रहे
ज्योति हर पल अँधेरे भगाती रहे
स्नेह भर-भर जालाओ दिये इस तरह
रोशनी व्योम में खिलखिलाती रहे

-डॉ० जगदीश व्योम

दीप के पर्व पर

दीप के पर्व पर
दीप की वर्तिका
स्नेह से स्निग्ध होकर
जले इस तरह
बह चले
ज्योति की एक भागीरथी
और उसमें
नहाने लगे ज्योत्सना
हर नगर
हर डगर
हर तरफ व्योम पर
खेत खलिहान में
घर में
आँगन में
हर एक इंसान में
ज्योति के पर्व की है
यही कामना
दीप के पर्व की
कोटि शुभकामना

-डॉ० जगदीश व्योम

दीवाली की रात

हँसी फुलझड़ी-सी महलों में दीवाली की रात
कुटिया रोयी सिसक-सिसक कर दीवाली की रात

कैसे कह दें, बीत गया युग, ये है बात पुरानी
मर्यादा की लुटी द्रोपदी दीवाली की रात

घर के कुछ लोगों ने मिलकर खूब मनायीं खुशियाँ
शेष जनों से दूर बहुत थी दीवाली की रात

जुआ खेलता रहा बैठकर वह घर के तलघर में
रहे सिसकते चूल्हा चक्की दीवाली की रात

भोला बचपन भूल गया था क्रूर काल का दंशन
फिर-फिर याद दिला जाती है दीवाली की रात

तम के ठेकेदार जेब में सूरज को बैठाये
कैद हो गई चन्द घरों में दीवाली की रात

एक दिया माटी का पूरी ताकत से हुंकारा
जल कर जगमग कर देंगे हम दीवाली की रात
     
    -डॉ० जगदीश व्योम

30 July, 2017

माँ भारती के भाल की

माँ भारती के भाल की शृंगार है हिन्दी
हिन्दोस्ताँ के बाग की बहार है हिन्दी 

घुट्टी के साथ घोल कर माँ ने पिलाई थी
स्वर फूट पड़ रहा वही मल्हार है हिन्दी 

तुलसी कबीर सूर औ रसखान के लिए
ब्रह्मा के कमण्डल से बही धार है हिन्दी

सिद्धान्तों की बात से न होएगा भला
अपनाओगे नहीं अगर व्यवहार में हिन्दी

मनने लगा है "विश्व हिन्दी दिवस" विश्व में
सम्पूर्ण विश्व के लिए उपहार है हिन्दी 

माना कि रख दिया है संविधान में मगर
पन्नों के बीच आज तार-तार है हिन्दी

सुनकर के तेरी आह व्योम थरथरा रहा
वक्त आने पे बन जायेगी तलवार ये हिन्दी


-डा० जगदीश व्योम

सबको सुहाने वाले

सबको सुहाने वाले, दुख को मिटाने वाले,
  कलि को भगाने वाले तुलसी के राम हैं।
नाश के कगार से बचा लिया था भारत को,
  मानस के राम का स्वरूप अभिराम है।
एक बार तुलसी ने देखा कृष्ण वंशी हाथ,
  मुख से न बोले कुछ, किया न प्रणाम है।
पूछने पै हुलसी के लाल ने सगर्व कहा,
  तुलसी का राम तो धनुष धारी राम है।

-डा० जगदीश व्योम

मुगलों के अत्याचार

मुगलों के अत्याचार हो गये थे बेसुमार
आर्यों की होने वाली खतम कहानी थी
अपने ही घर में बने हुये थे पंगु सभी
होते देख क्रूर कृत्य पशुता लजानी थी
हुलसी के लाल तुलसी ने देख हूक भरी
अब ना नसैहौं जैसे अब लौं नसानी थी
दाँतन के बीच जीभ के समान रहके भी
धन्य धन्य तुलसी रामायन बखानी थी।

-डा० जगदीश व्योम

19 June, 2017

आँख दिखाई सूर्य ने

आँख दिखाई सूर्य ने, धरा हो गई लाल ।
पशु-पक्षी व्याकुल हुए, मनुज हुए बेहाल ।।
-डा॰ जगदीश व्योम

01 October, 2016

है किसकी तस्वीर !

सोचो और बताओ
आखिर है किसकी तस्वीर ?

नंगा बदन, कमर पर धोती
और हाथ में लाठी
बूढ़ी आँखों पर है ऐनक
कसी हुई कद-काठी
लटक रही है बीच कमर पर 
घड़ी बँधी जंजीर
सोचो और बताओ 
आखिर है किसकी तस्वीर?

उनको चलता हुआ देखकर
आँधी शरमाती थी
उन्हें देखकर, अँग्रेजों की 
नानी मर जाती थी
उनकी बात हुआ करती थी
पत्थर खुदी लकीर
सोचो और बताओ
आखिर है किसकी तस्वीर ?

वह आश्रम में बैठ
चलाता था पहरों तक तकली
दीनों और गरीबों का था 
वह शुभचिंतक असली
मन का था वह बादशाह, 
पर पहुँचा हुआ फकीर
सोचो और बताओ, 
आखिर है किसकी तस्वीर?

सत्य अहिंसा के पालन में 
पूरी उमर बिताई
सत्याग्रह कर करके 
जिसने आजादी दिलवाई
सत्य बोलता रहा जनम भर
ऐसा था वह वीर
सोचो और बताओ, 
आखिर है किसकी तस्वीर?

जो अपनी ही प्रिय बकरी का 
दूध पिया करता था
लाठी, डंडे, बंदूकों से 
जो न कभी डरता था
दो अक्टूबर के दिन 
जिसने धारण किया शरीर
सोचो और बताओ, 
आखिर है किसकी तस्वीर ?

-डा० जगदीश व्योम

23 May, 2016

देवदार

घाटियों के देवदारों की
यही अन्तर्कथा है
 
टहनियाँ अपनी हिलाकर
रात भर संवाद करते
भाँप कर कोई अंदेशा
ये अचानक मौन धरते
छेड़ता संगीत कोई
रंध्र इनके जाग जाते
कुछ पलों को ही सही
सब भूत, भय के भाग जाते
पसरती चुप्पी हवा में
घुल गई कैसी व्यथा है
घाटियों के देवदारों की 
यही अन्तर्कथा है

ये खड़े बनकर तपस्वी
वक्त के आघात सहते
पंछियों की पीर को
महसूस कर भी, कुछ न कहते
पर्वतों के साथ रहते हैं
हवा में झूमते हैं
पाँव स्थिर हैं, टहनियों के
सहारे घूमते हैं
है दरख्तों की कहानी यह,
नहीं कुछ अन्यथा है
घाटियों के देवदारों की ...


-डा० जगदीश व्योम

29 June, 2015

हिरना क्यों उदास मन तेरा

हिरना !
क्यों उदास मन तेरा
अभी बची वाकी हरियाली
उजड़ा नहीं वसेरा

कुछ नन्हें विरबे मुरझाये
कुछ वनचर घबराये
सहमे-सहमे तोता मैना
कुछ भी बोल न पाये
बूढ़ा बरगद
खड़ा अकेला
अवसादों ने घेरा

जंगल में मंगल होगा
ये सपने गए दिखाये
सिंहासन मिल गया
भला फिर
वादे कौन निभाये
जाने कौन घड़ी रुख बदले
फिरे हवा का फेरा
हिरना !
क्यों उदास मन तेरा

-डा० जगदीश व्योम
29-06-2015

08 February, 2015

चाय के बागान में

आओ हम चलें कहीं
चाय के बागान में
पाँव रहें धरती पर
हाथ आसमान में

टेढ़े हैं रास्ते, पर
लोग बहुत सीधे
सदियों से खड़े पेड़
चाय के, हैं उनींदे
बिना शोर किये हवा
बतियाती कान में

छोटी-छोटी टोलियों में
बादल के छौने
उड़कर आ जाते
जाने कहाँ से भिगोने
छिपकर फिर हँसते हैं
चिड़ियों के गान में


सड़कें मुन्नार की हैं
दूध से धुली हुईं
बाँधे पहाड़ों को
फिर भी हैं खुली हुईं
इर्द-गिर्द बिछे हैं
गलीचे सम्मान में

-डा० जगदीश व्योम