मस्त मंजीरा खनकाय रही मीरा औरु
रस की गगरिया रसखान ढरकाबै हैं
संग संग खेलैं खेल सूर ग्वाल-बालन के
दुहि पय धेनु को पतूखी में पियाबैं है
कूटि कूटि भरे लोकतत्व के सकोरा
गीत गाथन की ध्वनि जहां कान पिर जाबै है
ऐसी बृजभूमि एक बेर देखिबे के काज
देवता के देवता को मनु ललचाबै है
-डा० जगदीश व्योम
रस की गगरिया रसखान ढरकाबै हैं
संग संग खेलैं खेल सूर ग्वाल-बालन के
दुहि पय धेनु को पतूखी में पियाबैं है
कूटि कूटि भरे लोकतत्व के सकोरा
गीत गाथन की ध्वनि जहां कान पिर जाबै है
ऐसी बृजभूमि एक बेर देखिबे के काज
देवता के देवता को मनु ललचाबै है
-डा० जगदीश व्योम