09 December, 2017

नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन

नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन आमों पर खूब बौर आये भँवरों की टोली मँडराये बगिया की अमराई में फिर कोकिल पंचम स्वर में गाये फिर उठें गंध के गुब्बारे फिर महके अपना चन्दन वन नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन गौरैया बिना डरे आये घर में घोंसला बना जाये छत की मुँडेर पर बैठ काग कह काँव-काँव फिर उड़ जाये मन में मिसिरी घुलती जाये सबके आँगन हों सुखद सगुन नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन बच्चों से छिने नहीं बचपन वृद्धों का ऊबे कभी न मन हो साथ जोश के होश सदा मर्यादित बनी रहे फैशन जिस्मों की यूँ न नुमाइश हो बदरँग हो जायें घर आँगन नववर्ष तुम्हारा अभिनन्दन घाटी में फिर से फूल खिलें फिर रुके शिकारे तैर चलें बह उठे प्रेम की मन्दाकिनि हिम-शिखर हिमालय से पिघलें सोनी मचले, महिबाल चले राँझे की हीर करे नर्तन नववर्ष तुम्हारा अभिनन्दन विज्ञान ज्ञान के छुए शिखर पर चले शांति के ही पथ पर हिन्दी भाषा के पंख लगा कम्प्यूटर जी पहुँचें घर-घर वे देश रहें खुशहाल ‘व्योम’ धरती पर जहाँ प्रवासी जन नववर्ष तुम्हारा अभिनन्दन थोड़ी-सी राजनीति सुधरे थोड़ा-सा जनगण भी सुधरे मीडिया चले सच के पथ पर छँट जायें निराशा के कुहरे शिक्षा के विस्तृत आँगन में कुछ और हो सके परिवर्तन नववर्ष तुम्हारा अभिनन्दन -डॉ0 जगदीश व्योम

2 comments:

Manju Mishra said...

बहुत ही सुन्दर एवं सार्थक संदेश देता हुअा प्यारा सा गीत

Manju Mishra said...

बहुत ही सुन्दर एवं सार्थक संदेश देता हुअा प्यारा सा गीत