30 July, 2017

माँ भारती के भाल की

माँ भारती के भाल की शृंगार है हिन्दी
हिन्दोस्ताँ के बाग की बहार है हिन्दी 

घुट्टी के साथ घोल कर माँ ने पिलाई थी
स्वर फूट पड़ रहा वही मल्हार है हिन्दी 

तुलसी कबीर सूर औ रसखान के लिए
ब्रह्मा के कमण्डल से बही धार है हिन्दी

सिद्धान्तों की बात से न होएगा भला
अपनाओगे नहीं अगर व्यवहार में हिन्दी

मनने लगा है "विश्व हिन्दी दिवस" विश्व में
सम्पूर्ण विश्व के लिए उपहार है हिन्दी 

माना कि रख दिया है संविधान में मगर
पन्नों के बीच आज तार-तार है हिन्दी

सुनकर के तेरी आह व्योम थरथरा रहा
वक्त आने पे बन जायेगी तलवार ये हिन्दी


-डा० जगदीश व्योम

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