23 May, 2016

देवदार

घाटियों के देवदारों की
यही अन्तर्कथा है
 
टहनियाँ अपनी हिलाकर
रात भर संवाद करते
भाँप कर कोई अंदेशा
ये अचानक मौन धरते
छेड़ता संगीत कोई
रंध्र इनके जाग जाते
कुछ पलों को ही सही
सब भूत, भय के भाग जाते
पसरती चुप्पी हवा में
घुल गई कैसी व्यथा है
घाटियों के देवदारों की 
यही अन्तर्कथा है

ये खड़े बनकर तपस्वी
वक्त के आघात सहते
पंछियों की पीर को
महसूस कर भी, कुछ न कहते
पर्वतों के साथ रहते हैं
हवा में झूमते हैं
पाँव स्थिर हैं, टहनियों के
सहारे घूमते हैं
है दरख्तों की कहानी यह,
नहीं कुछ अन्यथा है
घाटियों के देवदारों की ...


-डा० जगदीश व्योम

1 comment:

Vandana Ramasingh said...

बहुत बढ़िया नवगीत आदरणीय