आयौ है बसंत घर नहिं सखि कंत आयौ
पंथ हेरि हारि गई अँखियाँ हमारी हैं
कुहुकि कुहुकि के संदेशों सो सुनाय रही
अमवा की डारन के पांव भए भारी हैं
हिय में हिलोर औरु मीठी सी मरोर उठै
पीर पोर पोर अंग अंग में खुमारी है
मारि मारि तारी हँसै वेदना कुँवारी, पिय
ऐसौ है अनारी एक चिठिया न डारी है
-डा० जगदीश व्योम
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