आओ हम चलें कहीं
चाय के बागान में
पाँव रहें धरती पर
हाथ आसमान में
टेढ़े हैं रास्ते, पर
लोग बहुत सीधे
सदियों से खड़े पेड़
चाय के, हैं उनींदे
बिना शोर किये हवा
बतियाती कान में
छोटी-छोटी टोलियों में
बादल के छौने
उड़कर आ जाते
जाने कहाँ से भिगोने
छिपकर फिर हँसते हैं
चिड़ियों के गान में
सड़कें मुन्नार की हैं
दूध से धुली हुईं
बाँधे पहाड़ों को
फिर भी हैं खुली हुईं
इर्द-गिर्द बिछे हैं
गलीचे सम्मान में
-डा० जगदीश व्योम
चाय के बागान में
पाँव रहें धरती पर
हाथ आसमान में
टेढ़े हैं रास्ते, पर
लोग बहुत सीधे
सदियों से खड़े पेड़
चाय के, हैं उनींदे
बिना शोर किये हवा
बतियाती कान में
छोटी-छोटी टोलियों में
बादल के छौने
उड़कर आ जाते
जाने कहाँ से भिगोने
छिपकर फिर हँसते हैं
चिड़ियों के गान में
सड़कें मुन्नार की हैं
दूध से धुली हुईं
बाँधे पहाड़ों को
फिर भी हैं खुली हुईं
इर्द-गिर्द बिछे हैं
गलीचे सम्मान में
-डा० जगदीश व्योम
1 comment:
बिना शोर किए हवा बतियाती कान में ...
..
वाह !
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