31 January, 2015

ये जंगल एक अजूबा है

तोते से मैना
यूँ बोली
ये जंगल एक अजूबा है

टहनी
शाखाओं से लड़ती
पत्ते
आपस में जूझ रहे
बूढ़ी जड़
मिट्टी से चिपकी
अपनी पीड़ा को
मौन गहे
खो गये कहाँ
सब संस्कार
अब
आगे क्या मंसूबा है

सबके
अपने-अपने दल हैं
हर दल
दलदल में धँसा हुआ
वैसे तो
चेहरों पर लाली
पर
गला सभी का फँसा हुआ
यूँ तो है
चहल-पहल
लेकिन
मन सबका डूबा-डूबा है

भेड़ों ने
आपस में मिलकर
अपना प्रतिनिधि
इस बार चुना
रह गई
धरी की धरी चाल
स्यारों को
सबने खूब धुना
पर, खेल वही
सब ज्यों का त्यों
ये कैसा
‘व्योम’ अजूबा है

भेड़ें आपस में
भिड़ बैठीं
हो गई
खूब गुत्थमगुत्था
अब
भेड़-भेड़िये के भ्रम में
है प्रश्नचिह्न
फिर अलवत्ता
है कौन भेड़
भेड़िया कौन
अब तक न
किसी को सूझा है

-डा० जगदीश व्योम


1 comment:

Vandana Ramasingh said...

बहुत बढ़िया नवगीत