युग-युग से नारी ने पायी वस इतनी सौगात
दिन चूल्हे पर बीता औ' चक्की पर बीती रात
जन्म पूर्व से मिली वेदना, शिशुपन मिला अभाव
बचपन में ममता के बदले मिले उपेक्षा भाव
कुछ पीड़ा, कुछ घुटन और कुछ दर्द भरे संघात
दिन चूल्हे पर बीता......
यौवन की देहरी चढ़ने से पूर्व लगे प्रतिबंध
सिसक-सिसक रह गये कुँवारे के क्वाँरे अनुबंध
घृणा, उपेक्षा, दंश-भरे वाक्यांश, घात-प्रतिघात
दिन चूल्हे पर बीता......
आकर्षण दहेज के प्रति कुछ ऐसा बढ़ा प्रचंड
रुग्ण हुआ युगबोध, हुई नैतिकता भी उद्दंड
जग-जननी को मिले जगत से ये ओछे आघात
दिन चूल्हे पर बीता......
वैचारिक आचार पाशविक नारी के प्रति युग का
और नहीं तो आज शास्त्र क्यों बैठा दुबका-दुबका
अग्निस्नात, अकाल-मृत्यु या करुणा की बरसात
दिन चूल्हे पर बीता......
शस्त्र-शास्त्र तो रहे सदा से नारी के आभारी
फिर भी नारी आदिम युग से अब तक रही दुखारी
क्षितिज अधूरी, व्योम अधूरा, रही अधूरी बात
दिन चूल्हे पर बीता......
बदल रहा युगबोध जहाँ, है उसको सतत प्रणाम
आदर्शों के संपालन हित मत बन जाना राम
युग-सीताएँ रहीं झेलतीं कितने झंझावात।
युग युग से नारी ने पाई है इतनी सौगात
दिन चूल्हे पर बीता औ चक्की पर बीती रात।
-डा० जगदीश व्योम