29 January, 2023

भँवरा जब आता है

भँवरा जब आता है
गुमसुम कलियों का
घूँघट खुलवाता है 

-डा. जगदीश व्योम

10 November, 2022

और बात है

गीत बाँच कर
मंचों पर
ताली बजवाना और बात है
पर, गीतों में
पानी को
पानी कह पाना और बात है

सुविधाएँ
अच्छी लगती हैं
सभी चाहते हैं सुविधाएँ
सुविधा लेकर
सुविधाओं का
मोल चुकाना और बात है
गीत बाँच कर...

यूँ तो
सबकी देखा देखी
उसने भी ऐलान कर दिया
पर
अपने ही निर्णय पर
टिक कर रह पाना और बात है
गीत बाँच कर...

पदक और पैसों की
ढेरी पर चढ़कर
ऊँचे लगते हैं
लेकिन
युग-कवियों का फिर
कुंभन बन पाना और बात है
गीत बाँच कर...

-डा० जगदीश व्योम

12 January, 2022

युग-युग से नारी ने पायी

 युग-युग से नारी ने पायी वस इतनी सौगात 
दिन चूल्हे पर बीता औ' चक्की पर बीती रात

जन्म पूर्व से मिली वेदना, शिशुपन मिला अभाव
बचपन में ममता के बदले मिले उपेक्षा भाव 
कुछ पीड़ा, कुछ घुटन और कुछ दर्द भरे संघात
दिन चूल्हे पर बीता......

यौवन की देहरी चढ़ने से पूर्व लगे प्रतिबंध
सिसक-सिसक रह गये कुँवारे के क्वाँरे अनुबंध 
घृणा, उपेक्षा, दंश-भरे वाक्यांश, घात-प्रतिघात 
दिन चूल्हे पर बीता......

आकर्षण दहेज के प्रति कुछ ऐसा बढ़ा प्रचंड 
रुग्ण हुआ युगबोध, हुई नैतिकता भी उद्दंड 
जग-जननी को मिले जगत से ये ओछे आघात 
दिन चूल्हे पर बीता......

वैचारिक आचार पाशविक नारी के प्रति युग का 
और नहीं तो आज शास्त्र क्यों बैठा दुबका-दुबका 
अग्निस्नात, अकाल-मृत्यु या करुणा की बरसात 
दिन चूल्हे पर बीता......

शस्त्र-शास्त्र तो रहे सदा से नारी के आभारी 
फिर भी नारी आदिम युग से अब तक रही दुखारी 
क्षितिज अधूरी, व्योम अधूरा, रही अधूरी बात 
दिन चूल्हे पर बीता......

बदल रहा युगबोध जहाँ, है उसको सतत प्रणाम 
आदर्शों के संपालन हित मत बन जाना राम 
युग-सीताएँ रहीं झेलतीं कितने झंझावात।
 
युग युग से नारी ने पाई है इतनी सौगात 
दिन चूल्हे पर बीता औ चक्की पर बीती रात।

-डा० जगदीश व्योम


19 November, 2020

महादेवी वर्मा के प्रति

अपने जीवन के पल प्रति पल को
दीप-वर्तिका बना-बना
जलकर भी जिसने आह न की
कर दूर अवनि का तिमिर घना
क्या सुनते हैं ये कान 
वही देवी छलना से छली गई
दीवाली से पहले अपना 
दीप बुझा कर चली गई।

पहले प्रसाद ने मुँह मोड़ा
अलविदा निराला बोल गए
चिर पथिक पंत जब हुए
धरा रोई थी सागर डोल गए
अब कौन हरेगा तपन, 
नीर वाली बदली तो चली गई।

नीहार प्रथम परिचय जिसका
फिर रश्मि युवा की संगिनि थी
मन प्रौढ़ हुआ, नीरजा बनी
फिर सांध्यगीत में संध्या थी
सिद्धावस्था की चौखट पर
जब दीपशिखा की ज्योति जली
वह ज्योति! आज 
उस महाज्योति का साथ निभाने चली गई।

निज जीवन की आहुति देकर
जो बनी सहेली हिंदी की
हिंदी साक्षात भारती है
वह देवि भाल की बिंदी थी
हिंदी को मान न दे पाए
पर उसे दिया जब अलंकरण
वह नहीं आम लोगों-सी थी
कर लेती पद्मभूषण का वरण
ले जाओ पद्मभूषण अपना
रखने से पीड़ा होती है
धिक्कार मुझे, धिक्कार तुम्हें
अपने घर हिंदी रोती है
वह कहाँ गई? क्यों गई? 
न जाने कौन लोक, किस गली गई।

बुझ गई दीप की शिखा मगर
लालिमा रहेगी सदियों तक
पंकिल भूतल को त्याग
व्योम में वास करेगी सदियों तक
लेखनी थाम कर लिखवाना
जब पथ भूलूँ तब आ जाना
धरती पर जब हो महा अंध
तब प्रथम रश्मि बन आ जाना
तुमको प्रणाम, शत-शत प्रणाम
कर रहा व्योम का रोम-रोम
स्वप्नों के खोले दरवाजे, 
स्पंदन बन कर चली गई
दीवाली से पहले अपना 
दीप बुझा कर चली गई।

-डा० जगदीश व्योम

16 December, 2019

सूरज के सातों रंग

सूरज के सातों रंग
मिलते हैं जब एक संग
तभी तो होता है प्रकाश
छूमंतर हो जाती है
अनन्त तमराशि
मुदित होती है
इकाइयों में बिखरी
समूची मानवता
इकाइयों से खिसक कर
दहाइयों, सैकड़ों,
हजारों, लाखों
और करोड़ों में
जब
होती है एकाकार
तभी तो होता है
राष्ट्रीय एकता का
जीवंत प्रतिमान साकार
कन्याकुमारी में
होने वाली
लहरों की पदचाप
सुन लेता है
संवेदनशील हिमालय
उस के अन्तस की पीड़ा
पिघलती है
और
बह उठती है
पतित पावनी गंगा बनकर
करोड़ों की पीड़ा से
द्रवित होते हैं करोड़ों
करोड़ों के आनन्द से
प्रफुल्लित भी
होते हैं करोड़ों
राष्ट्रीय एकता का
इतना विशाल सेतु
है भी तो नहीं
विश्व में
और कहीं
तभी तो बनाया है
प्रकृति ने
अपना
पालना यहीं

-डॉ० जगदीश व्योम

14 July, 2019

मोर

बगिया में जब आता मोर
सब के मन को भाता मोर

बादल जब पानी बरसाते
खुश हो नाच दिखाता मोर

घिर आती घनघोर घटा जब
तब पिउ–पिउ–पिउ गाता मोर

घूम–घूमकर नाच–नाचकर
सुन्दर पंख गिराता मोर

ककड़ी, खीरा, लौकी, तुरई
खरबूजा खा जाता मोर

घने पेड़ हों जहाँ कहीं 
घर अपना वहीं बनाता मोर

पंख देख कर खुश हो जाता
पैर देख रो जाता मोर 

हमको आता हुआ देख कर
जाने क्यों उड़ जाता मोर

-डा॰ जगदीश व्योम

30 April, 2019

पावन गंगा

पावन गंगा बहायी धरा पर, पौरुष की वह खान तुम्हीं हो
बज्र बनावन हेतु तजे निज प्रान, दधीच महान तुम्हीं हो
शक्ति अकूत की कूत नहीं कर पाते थे जो, हनुमान तुम्हीं हो
हे मजदूर किसान ! मेरे इस देश के तो भगवान तुम्हीं हो

 -डा० जगदीश व्योम


05 February, 2019

काफिला निकल पड़ा है

अक्षर की ईंटों से रक्खें
शब्दों की बुनियाद
काफिला निकल पड़ा है
काफिला.......

वर्णों को जाने-पहचाने
बुने शब्द के ताने-बाने
वाक्य बनाकर पढ़ें कहानी
कविता कर लें याद
काफिला निकल पड़ा है
काफिला........

छुट्टी में स्कूल चलेंगे
रोज सीखकर कुछ निकलेंगे
खेल-खेल में रोज करेंगे
पढ़ने का अभ्यास
काफिला निकल पड़ा है
काफिला.......

मम्मी आप गाँव मत जाना
थोड़ा पापा को समझाना
नानी को दिल्ली बुलवा लो
बस इत्ती सी बात
काफिला निकल पड़ा है
काफिला.......

मुझको पढ़ना आ जायेगा
भैया नहीं चिढ़ा पायेगा
मम्मी के सँग किया करूँगी
मैं भी फिर संवाद
काफिला निकल पड़ा है
काफिला.......

मम्मी-पापा संग हमारे
विद्यालय अब प्यारे-प्यारे
साथ हमारे खड़ी
आप की दिल्ली की सरकार
काफिला निकल पड़ा है
काफिला.......

घर से विद्यालय आयेंगे
ज्ञान-पंख हम पा जायेंगे
इन पंखों से उड़ें व्योम तक
छूने को आकाश
काफिला निकल पड़ा है
काफिला.......

-डा० जगदीश व्योम

25 December, 2018

जाने क्या बतियाते पेड़

टहनी हिला-हिला
आपस में
जाने क्या बतियाते पेड़

जंगल की सब खुफिया बातें
इनके ज़ेहन में रहतीं
कितनी चीखें घुली हवा में
पूरे युग का सच कहतीं
हद से बेहद
अत्याचारों से
जब-तब
अकुलाते पेड़
टहनी हिला-हिला........

हिरन-हिरनियों के
बेसुध दल पर जब
हाँका पड़ जाता
तितर-बितर होकर
जंगल का
सब गणतंत्र बिखर जाता
खुद को विवश समझकर
अपने मन में
बहुत लजाते पेड़
टहनी हिला-हिला.......

राजा अहंकार में डूबा
हुमक-हुमक कर चलता है
एक नहीं हो पाये जंगल
इसी जुगत में रहता है
राजा की
दोमुँही सोच पर
अन खाये
अनखाते पेड़
टहनी हिला-हिला........

जंगल में कितनी ताकत है
कौन इन्हें अब समझाये
ये चाहें तो
राजा क्या है
अखिल व्योम भी झुक जाये
मार हवा के टोने
सबको
रहते सदा जगाते पेड़
टहनी हिला-हिला
आपस में
जाने क्या बतियाते पेड़

-डा० जगदीश व्योम

26 September, 2018

भेड़ की नियति

भेड़ को
लाख समझाओ
कि
अपना रवैया बदलो
जिधर सब जा रही हैं
उधर नहीं
वरन, अपनी आँखों से
देखकर चलो
अपने कानों से सुनो
और
अपना रास्ता स्वयं चुनो
सबके साथ
बिना सोचे यूँ ही जाओगी
तो,
अपने बाल नुचवाओगी
एक के
गड्ढे में गिरते ही
सबकी सब गिर जाओगी
बेमौत मारी जाओगी

तुम्हारे द्वारा चुना हुआ
तुम्हारा प्रतिनिधि
चुनते ही
भेड़ से भेड़िया हो जाता है
और फिर
चापलूस सियारों से घिर जाता है
मगर
तुम तो वही करोगी
जो सब करेंगे
फिर
उसके अत्याचारों से
क्यों रोती हो ?
आखिर वही तो काटोगी
जो तुम स्वयं बोती हो

तुम्हारी एकता
एक ज़िन्दा मिसाल है
फिर भी
तुम्हारा ये हाल है
तुम्हारी एकता
सिर्फ अत्याचार सहने के लिए है
सिर्फ अत्याचार सहने के लिए
तुम्हें तो अपनी बोटियाँ
भेड़िये से नुचवाने में
मज़ा आता है
वह एक
तुम अनेक
फिर भी
उसके अत्याचारों को
वरदान समझ कर सहती हो
सबकी सब सिर झुकाये
चुपचाप देखती रहती हो
सोचती रहती हो कि
अभी "हम तो बचे हैं"
कमबख़्तो, इंतज़ार करती हो कि
हमारा कब नम्बर आये...
और फिर
जब
कोई भेड़ ही बन जाये
तो फिर उसे
भेड़िये से कौन बचाये
क्यों बचाये
किसलिए बचाये...

-डा० जगदीश व्योम


12 September, 2018

वक़्त बुरा जब आता है

वक़्त बुरा जब आता है तो रह रह कर चिल्लाते लोग
स्वार्थ हुआ पूरा जैसे ही सस्ते में बिक जाते लोग

चाहे जितने महल बना ले लूट-लूट कर घर भर ले
कालचक्र के भँवर जाल में तिनके से बह जाते लोग

बड़ी-बड़ी डिगरियाँ ज्ञान की वहाँ धरी रह जाती हैं
जहाँ व्यवस्था अंधी होती तिकड़म वहाँ भिड़ाते लोग

भोला बचपन चौराहों पर जूठन चाट-चाट जीता
कुत्ते घुमा रहे कारों में तनिक नहीं शरमाते लोग


-डा० जगदीश व्योम

बहते जल के साथ न बह

बहते जल के साथ न बह
कोशिश कर के मन की कह

कुछ तो खतरे होंगे ही
चाहे जितना छिपकर रह

मौसम ने तेवर बदले
होगी कुछ तो खास वजह

लोग तुझे कायर समझें
इतने अत्याचार न सह

झूठ कपट मक्कारी का
चारण बनकर ग़ज़ल न कह


-डा० जगदीश व्योम

02 September, 2018

माटी की सोंधी सुगंध सनी

माटी की सोंधी सुगंध सनी
मनमोहिनी है रसखान की भाषा
शब्द ढरे, निखरे, सुथरे
भई हीरकनी रसखान की भाषा
रीझी है कान्ह की कामरिया पै
बनी बँसुरी रसखान की भाषा
स्याम नचैं छछिया भरि छाछ पै
देखि हँसै रसखान की भाषा

-डा० जगदीश व्योम

माटी की सोंधी

माटी की सोंधी सुगंध समाहित
ऐसी सुवासित सूर की भाषा
स्याम कौं खेलत, नाचत, खात
रिसात दिखावति सूर की भाषा
वस्त्र विहीन नहावत देखि कैं
चीर चुरावति सूर की भाषा
बेंचत देखि कैं दूध, दही सब
छीनि खबावति सूर की भाषा

-डा० जगदीश व्योम
         

19 August, 2018

जला दिया संविधान

जला दिया संविधान संसद के सीने पर
और तुम बैठकर तमाशा देखते रहे
नफा-नुकसान का लगाते रहे अनुमान
बैठे-बैठे शकुनी के पाँसें फेंकते रहे
भरा हुआ कितना ज़हर इन पुतलों में
तार कहीं और से तुम्हीं तो खैंचते रहे
ऐसे देश द्रोहियों की पीठ ठोंक-ठोंक तुम
देश-भक्त होने का सुआंग रचते रहे


-डा० जगदीश व्योम