22 January, 2014

झूठों की दुनिया में

 हम झूठ बोलने के
इतने अभ्यस्त हुए
कहते कुछ और
बखान और कुछ करते हैं
चेहरों पर चिपके हुए
मुखौटों के युग में
हम बिना मुखौटे के
रहने में डरते हैं

जो सुबह सभा में
जोश भरे नारे देते
संध्या होते-होते
सस्ते बिक जाते हैं
आईना वक्त का
नहीं अभी धुँधलाया है
जैसी जिसकी छवि है
इसमें दिख जाते हैं
अवसर बेईमानी का
जिनको नहीं मिला
बेईमानो को बहुत
गालियाँ देते हैं
जब कभी
दाँव लगता इनका
फिर मत पूछो
भ्रष्टों के सभी रिकार्ड
ध्वस्त कर देते हैं

है क़तरा-क़तरा खून
गुलामी का आदी
खिदमत करने के
हैं अभ्यस्त हुजूरों की
सभ्यता हमारी दरवारी
चाकरपन अपनी रग-रग में
क्या कहा !
‘सत्य’ को सत्य कहें
तौबा ! तौबा !
बाजीगर की बस्ती में तो
होती है पूछ जमूरों की
यूँ तो हम
सर से पाँव तलक ही झूठे हैं
पर, रौब जमाकर
सच साबित कर लेते हैं

हैं लोग अधिकतर
इस मज़में में बिके हुये
मतलब सधने पर
‘बाप’ गधे को कह लेते
देखे हमने कुछ संत
सीकरी में जाकर
फ़रसी आदाब बज़ाते
स्वारथ के नाते
इनकी लफ्फा़जी पर
विश्वास न कर लेना
गिरगिट हैं
मौसम के अनुरूप
बदल जाते
देखी,
लिजलिजी जरा सी भी
गुड़ की ढेली
ये स्वार्थ-कीट हैं
जाकर
वहीं चिपक जाते
पर
इस युग में भी
दो-चार झूठ के दुश्मन हैं
जो, अखिल विश्व के
आरोपों को सहते हैं
नाराज़ भले हो जाये
उनसे सिंहासन
पर
बात उसूलों की
वे, निर्भय कहते हैं
हम झूठ .......।

-डा॰ जगदीश व्योम
[रचना काल : 19-02-1998]

3 comments:

संध्या सिंह said...

रचना कई बार पढी .....बेहद तल्ख़ रचना .....व्यवस्था का आक्रोश फूट कर बहा है ....कितनी बारीकी से विश्लेषण किया है सत्ता के दांव पेंचों का ...जहां स्वार्थ और लोभ देश का हित निगल जाते हैं .....बहुत सुन्दर रचना पूर्णतः सहमत हूँ ...शुभकामनाएं आपको जगदीश व्योम जी

ashwini kumar vishnu said...

असहमत होने की तो सम्भावना ही नहीं है. चुनावी वादों-नारों-घोषणाओं का दिखावा ढोते, छद्म झेलते, मिथ्याचार सहते वर्तमान में , व्यवस्था के जिस भ्रष्ट और पंकिल चरित्र से आज हम रू-ब-रू हैं यह सुन्दर रचना उसी त्रासद स्थिति का सफल उद्घाटन करती है...
इनकी लफ्फा़जी पर
विश्वास न कर लेना
गिरगिट हैं
मौसम के अनुरूप
बदल जाते
देखी,
लिजलिजी जरा सी भी
गुड़ की ढेली
ये स्वार्थ-कीट हैं
जाकर
वहीं चिपक जाते........................संयत शब्दों में बहुत सधा हुआ प्रहार है राजनीति का मुखौटा लगाए घूमते, जनसामान्य के साथ दगाबाजी कर सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना हितसाधन करते, सत्ता के दलालों पर ! पाठक पर यथेष्ट प्रभाव छोड़ने में पूर्ण सक्षम कृति !

Madan Mohan 'Arvind' said...

आज का यथार्थ आपकी इस रचना में बोल खुल कर बोल रहा हिल