13 January, 2014

रात की मुठ्ठी

-डा॰ जगदीश व्योम

वक्त का आखेटक
घूम रहा है
शर संधान किए
लगाए है टकटकी
कि हम
करें तनिक सा प्रमाद
और, वह—
दबोच ले हमें
तहस नहस कर दे
हमारे मिथ्याभिमान को
पर
आएगा सतत नैराश्य ही
उसके हिस्से में
क्यों कि
हमने पहचान ली है
उसकी पगध्वनि
दूर हो गया है हमसे
हमारा तंद्रिल व्यामोह
हम ने पढ़ लिए हैं
समय के पंखों पर उभरे
पुलकित अक्षर
जिसमें लिखा है कि —
आओ !
हम सब मिल कर
खोलें, रात की मुठ्ठी को
जिसमें कैद है
समूचा सूरज

-डा॰ जगदीश व्योम

3 comments:

ashwini kumar vishnu said...

हमने पढ़ लिए हैं
समय के पंखों पर उभरे
पुलकित अक्षर...
बहुत सुन्दर ! समय के शिकारी के सन्धान का पूर्वानुमान कोई सहज-सरल क्रिया नहीं है. यह कविता जीवन के जिन दोषों की तरफ़ इंगित कर रही है वे हैं: प्रमाद और मिथ्याभिमान. मनुष्य प्रतिक्षण सीमाओं में घिरा है फिर भी अतिरेक में बह जाता है, अपने असीम होने के व्यामोह में जकड़ा जाता है. इनसे उबरकर यदि देखा जाए तो हर पराजय को जीत में बदला जा सकता है और नैराश्य के तिमिर में आशा के सूर्य को उगाया जा सकता है. भव्य सन्देश लिए उत्तम कृति !

ashwini kumar vishnu said...

हमने पढ़ लिए हैं
समय के पंखों पर उभरे
पुलकित अक्षर...
बहुत सुन्दर ! समय के शिकारी के सन्धान का पूर्वानुमान कोई सहज-सरल क्रिया नहीं है. यह कविता जीवन के जिन दोषों की तरफ़ इंगित कर रही है वे हैं: प्रमाद और मिथ्याभिमान. मनुष्य प्रतिक्षण सीमाओं में घिरा है फिर भी अतिरेक में बह जाता है, अपने असीम होने के व्यामोह में जकड़ा जाता है. इनसे उबरकर यदि देखा जाए तो हर पराजय को जीत में बदला जा सकता है और नैराश्य के तिमिर में आशा के सूर्य को उगाया जा सकता है. भव्य सन्देश लिए उत्तम कृति !

Vandana Ramasingh said...

हमने पढ़ लिए हैं
समय के पंखों पर उभरे
पुलकित अक्षर...
बहुत सुन्दर सन्देश आदरणीय व्योम सर