कारवाँ की ज़द से बाहर कब निकल पाएँगे आप।
पत्थरों के दुर्ग में घुट—घुट के मर जाएँगे आप।।तालियाँ की गूँज से यदि आप खुश होते रहे।
लेखनी का धर्म फिर कैसे निभा पाएँगे आप।।
खोज लें कुछ रीढ़ वाले मित्र अपने वास्ते।
इन अबोले बटखरों से कैसे बतियाएँगे आप।।
हो गया कुर्ता पुराना अब बदल डालें इसे।
छोड़िए पैबंद कितने इसमें लगवाएँगे आप।।
लेखनी इस दौर में यदि आप की भी चुप रही।
वक्त की तहरीर में गद्दार कहलाएँगे आप।।
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