27 September, 2011

हे चिर अव्यय ! हे चिर नूतन !!


- डॉ0 जगदीश व्योम
( प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पंत के प्रति )


कण–कण तृण–तृण में
चिर निवसित
हे ! रजत किरन के अनुयायी
सुकुमार प्रकृति के उद्घोषक
जीवन्त तुम्हारी कवितायी
फूलों के मिस शत् वार नमन
स्वीकारो संसृति के सावन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!


बौछारें धारें जब आतीं
लगता है तुम नभ से उतरे
चाँदनी नहीं है पत्तों पर
चहुँ ओर तम्हीं तो हो बिखरे
तारापथ के अनुगामी का
कर रही धरा है मूक नमन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!


सुकुमार वदन, सुकुमार नयन
कौसानी की सुकुमार धूप
पूरा युग जिसमें संदर्शित
ऐसे कवि के तुम मूर्तरूप
हैं व्योम, पवन सब खड़े, लिये
कर में अभिनन्दन पत्र नमन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!

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