17 January, 2015

वृंदावन की विधवाएँ

श्वेत साड़ियों में लिपटी
बैठी मिल जाती हैं
उदासियाँ
बड़े मन्दिरों वाले
वृंदावन की
कितनी सँकरी गलियाँ

किसने
यहाँ इन्हें पहुँचाया
हर अपना
बन गया पराया
जाने कैसी सजा मिली है
कुछ भी नहीं
समझ में आया
इनके
अवचेतन में गुम हैं
पीहर-नैहर की
सब गलियाँ

गंगा-जमुना
सिमट गई है
कंचे-सी उभरी आँखों में
सागर का खारापन
किसने बाँधा
सपनीली पाँखों में
अपने स्वारथ की
जुगाड़ में
और
धर्म की इसी आड़ में
तहस-नहस कर दी
अपनों ने
इनके
सपनों की पंखुड़ियाँ

लिये कटोरा
बैठी रहती हैं
कुछ सिक्कों की
तलाश में
साँझ ढले पहुँचेगीं
मुट्ठी भर चावल की
बड़ी आस में
छप्पन भोग
सजे रहते हैं
पर
कहने वाले कहते हैं
ऊपर वाले ने
कर डालीं
क्यों इतनी
खण्डित प्रतिलिपियाँ

-डा० जगदीश व्योम

2 comments:

Yogi Saraswat said...

इनका दर्द शायद किसी को नही दीखता

Vandana Ramasingh said...

मार्मिक प्रस्तुति है आदरणीय