27 May, 2012

सवैया छंद


जब रूठि के लौटि चली रजनी, रजनीपति ने तब हाथ बढ़ायो
नीले दुकूल फँसी अँगुरी, झटकारि विभावरि ताहि छुड़ायो
छूटि झरे सिगरे मुक्ताहल, हाथ में यामिनि अंग न आयो
मीढ़ि के हाथ रह्यो पछतात, सुकामिनि सौं बतराय न पायो।

डा० जगदीश व्योम

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