( अपनी एक पुरानी कविता जिसे मैंने सूरतगढ़ र(राजस्थान) प्रवास के समय 20 नवम्बर 1989 को लिखा था, .. इसमें कुछ देशज शब्दों का प्रयोग है..... देखना है कि ये देशज शब्द कहाँ तक अपने को खोल पाते हैं। )
-डा0 जगदीश व्योम
मेरे गीतों के प्याले में
कौन वेदना घोल गया है
निकल पड़ा था
उस दिन घर से
कालचक्र के धकियाने से
चलता रहा निरीह पंथ पर
वाधाओं से कर हमजोली
कभी गिरा
ठोकर भी खायीं
आत्मीयता के पर्वत पर
कभी चढ़ा
उतरा फिर धम से
उठी कराह सभी आशायें
स्पंदित हो गई शिरायें
और
उसी क्षण आकर कोई
धीरे धीरे
क्लांत पथिक के लिए अचानक
द्वार कुटी का खोल गया है ....
मेरे गीतों के .........।
कहाँ गए बचपन के वे दिन
जब
मुँह अँधियारे में उठकर
सीप, लचैला, करुआ आमों
के नीचे जा
पके आम ढूँढ़ा करते थे
टटो टटोकर
कभी आम के धोखे
मिटटी के ढेले को
रख लेते थे आम समझकर
गिरता था जब
पका आम डाली से चू कर
दौड़ पड़ा करते थे
हम सब बच्चे मानो
आम नहीं
कुबेर की कोई अक्षयनिधि हो
कभी बाग में
अमरूदों की चोरी करने को
जाता था झुंड हमारा
कभी मका के खेतों में से
फूट ढूँढ़ना
और कभी मैरा (मचान) पर चढ़कर
भुने हुए भुटटों को खाना
कूद-कूद पुल के उपर से
दोपहरी भर खूब नहाना
दिन भर करते थे शैतानी
अपनी होती थी मनमानी
मगर नियति की ये विडम्बना
ऐसा हुआ समय परिवर्तित
बचपन ही अब लगा सिसकने
और गाँव का
शेष रहा गया नाम पुराना
जिनके साथ
बिताया हमने भोला बचपन
उन पेड़ों का
दूर-दूर तक पता नहीं है
सच कहता हूँ
पेड़ नहीं थे
वे थे सच्चे मित्र हमारे
आज
गाँव की धरती का
लगता मुझको भूगोल नया है
मेरे गीतों के प्याले में
कौन वेदना घोल गया है।
- डा0 जगदीश व्योम
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