-डा0 जगदीश व्योम
राजा मूँछ मरोड़ रहा है
सिसक रही हिरनी
बड़े-बड़े सींगों वाला मृग
राजा ने मारा
किसकी यहाँ मजाल
कहे
राजा को हत्यारा
राजा को हत्यारा
मुर्दानी छायी जंगल में
सब चुपचाप खड़े
सोच रहे सब यही कि
आखिर आगे कौन बड़े
घूम रहा आक्रोश वृत्त में
ज्यों घूमे घिरनी
एक कहीं से
स्वर उभरा
स्वर उभरा
मुँह
सबने उचकाये
सबने उचकाये
दबे पड़े साहस के
सहसा
सहसा
पंख उभर आये
मन ही मन
संकल्प हो गए
संकल्प हो गए
आगे बढ़ने के
जंगल के अत्याचारी से
जमकर लड़ने के
पल में बदली हवा
मुट्ठियाँ सबकी दिखीं तनी
रानी
तू कह दे राजा से
तू कह दे राजा से
परजा जान गई
अब
अपनी अकूत ताकत
अपनी अकूत ताकत
परजा
पहचान गई
पहचान गई
मचल गई
जिस दिन परजा
जिस दिन परजा
सिंहासन डोलेगा
शोषक की
औकात कहाँ
औकात कहाँ
कुछ
आकर बोलेगा
आकर बोलेगा
उठो उठो
सब उठो
सब उठो
उठेगी
पूरी विकट वनी
पूरी विकट वनी
-डा0 जगदीश व्योम
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