चंपा और चमेली बेला कचनार झूम उठे
धरती ने धानी चुनरी सी फहराई है
सुधि बुधि भूले सुत सारंग सुगंध सूंघि
ऐसी वा बिसासी अमवा की अमराई है
राह के बटोहियों के हिय कौं हिराय गई
काहू भृंगराज नैं बजाई शहनाई है
एक सुकुमारी सी कुमारी तरुमल्लिका की
होने वाली आज ऋतुराज से सगाई है
-डा० जगदीश व्योम
1 comment:
ek bar hame bhi mauka de yaha jaye...
http://rishabhpoem.blogspot.in/
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