05 July, 2012

चंपा और चमेली


चंपा और चमेली बेला कचनार झूम उठे
धरती ने धानी चुनरी सी फहराई है
सुधि बुधि भूले सुत सारंग सुगंध सूंघि
ऐसी वा बिसासी अमवा की अमराई है
राह के बटोहियों के हिय कौं हिराय गई
काहू भृंगराज नैं बजाई शहनाई है
एक सुकुमारी सी कुमारी तरुमल्लिका की
होने वाली आज ऋतुराज से सगाई है

-डा० जगदीश व्योम


1 comment:

Rishabh Shukla said...

ek bar hame bhi mauka de yaha jaye...
http://rishabhpoem.blogspot.in/