- डा० जगदीश व्योम
अब न जाने खील साखिलता नहीं क्यों मन !
गाँव का वह नीम टेढ़ा
याद आता है
पेड़ पीपल का अभी भी
छटपटाता है
बाग में चलते रहँट का
स्वर अनोखा-सा
खो गया जाने कहाँ
पर झनझनाता है।
रोशनी की फिर नुमायश
हो रही घर द्वार सबके
पर न जाने क्यों नहीं
मन से गई भटकन ।
माँ बताशा, खील, दीपक
घर सभी के भेजती थी
वह अमिट दौलत
अभी तक खर्च करता आ रहा हूँ
रोशनी तो कैद कर ली, ये
हकीकत है, मगर
इस शहर की भीड़ में
अब तक सदा तनहा रहा हूँ।
ज्योति का यह पर्व
मन को गुदगुदा पाता नहीं है
प्रश्न रह-रह उठ रहा
है कौन सा कारन !
हम समय की बाँह थामे
चल रहे बस चल रहे हैं
ठीकरों की होड़ में
जाने किसे हम छल रहे हैं
भेड़ियों की भीड़
वस्ती में पनपती जा रही फिर
संदली वन आस्थाओं के
निरन्तर जल रहे हैं।
है समय का फेर
या अंधेर चाहे जो समझ लो
नाश होता है हमेशा
वक्त का रावन !
-डा० जगदीश व्योम
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माँ बताशा खील दीपक
घर सभी के भेजती थी
वह अमिट दौलत
अभी तक खर्च करता आ रहा हूँ
रोशनी तो कैद कर ली है
हकीकत है मगर यह
इस शहर की भीड़ में
अब तक सदा तनहा रहा हूँ।
ज्योति का यह पर्व
मन को गुदगुदा पाता नहीं है
आपकी रचनाएं शिक्षण संस्था हैं जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है ....सादर
धन्यवाद वंदना जी
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