16 August, 2011

कैसा भ्रम है

-डा० व्योम
कैसा भ्रम है
अविरल क्रम है
हर पल,
क्षण सब कुछ बदला है
मेरा मन तो नहीं मानता
प्यार का रंग नहीं बदला है।।
कितने धोखे
छल-प्रपंच हैं
मक्कारों से भरे मंच हैं
झूठों की झूठी दुनिया में
झूठे ही बन गए पंच हैं
झूठ कहेंगे
झूठ सहेंगे
झूठ की खातिर
झूठ लिखेंगे
झूठ-नगर के कोलाहल में
झूठों का परचम बदला है
चलो झूठ ही लिख देता हूँ
प्यार का रंग नहीं बदला है ।।


-डा० व्योम

1 comment:

Dr (Miss) Sharad Singh said...

जीवन्त विचारों की बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना!