- डा० जगदीश व्योम
छिड़ता युद्ध बिखरता त्रासद
इंसां रोता है
जन संशय
त्रासदी ओढ़कर
आगे आया है
महानाश का
विकट राग फिर
किसने गाया है
पल में नाश
सृजन सदियों का
ऐसा होता है
वाट जोहती
थकित मनुजता
ले टूटी कश्ती
भय की छाया
व्यथित विकलता
औ फाकामस्ती
दम्भ-जनित
कंकाल सृजन के
कोई ढोता है
उठो मनुज!
थामनी पड़ेगी, ये
पागल आँधी
आज उगाने
होंगे घर-घर में
युग के गाँधी
मिलता ‘व्योम’
विरासत में, युग
जैसा बोता है
1 comment:
सुन्दर रचनाओं के लिए हार्दिक बधाई
Post a Comment